July 13, 2026

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CBI कोर्ट ने पवनराजे निंबालकर मर्डर केस पर सुनवाई के दौरान की अहम टिप्पणी

साल 2006 में नवी मुंबई के कलंबोली में हुए पवनराजे निंबालकर हत्याकांड ने पूरे महाराष्ट्र को झकझोर दिया था। दिनदहाड़े हुई इस गोलीबारी में पवनराजे निंबालकर और उनके ड्राइवर समद काज़ी की मौके पर मौत हुई थी। अब लगभग 20 साल बाद मुंबई की विशेष CBI अदालत इस चर्चित मामले में अंतिम फैसला सुना रही है। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश सत्यनारायण नावानंदार ने इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद बताया। अदालत ने कहा कि एक जननेता की इस तरह हत्या होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। शुरुआत में इस मामले की जांच कलंबोली पुलिस ने की थी, लेकिन जांच की धीमी गति को लेकर सवाल उठे।

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20 साल बाद पवनराजे निंबालकर हत्याकांड में CBI कोर्ट सुनाएगी अंतिम फैसला

न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में कानून के दायरे में रहकर न्याय करना बेहद जरूरी था। अदालत ने बताया कि केस के दौरान कुल 127 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और कई महत्वपूर्ण साक्ष्य रिकॉर्ड पर आए। आरोपी नंबर चार ने सरकारी गवाह बनने के लिए अदालत में आवेदन दिया था, जिसे बाद में स्वीकार किया गया। इसके बाद पूरे मुकदमे की सुनवाई दोबारा शुरू हुई और नए सिरे से कई पहलुओं की जांच हुई। अदालत ने कहा कि मामले में कई सरकारी वकील बदले गए और सुनवाई लंबी अवधि तक चलती रही। ओमराजे निंबालकर, रानी देवी और धाराशिव के कई लोगों ने अदालत में महत्वपूर्ण गवाही दी थी।

अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों के अनुसार मृतक पवनराजे निंबालकर और मुख्य आरोपी पद्मसिंह पाटिल के बीच राजनीतिक विवाद था। वर्ष 2002 के बाद दोनों नेताओं के संबंध लगातार खराब होते गए और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती गई थी। दोनों नेताओं ने विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था, जिसमें निंबालकर को हार का सामना करना पड़ा। अदालत ने माना कि दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक दुश्मनी के पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड पर मौजूद हैं। सीबीआई ने दावा किया कि राजनीतिक और व्यावसायिक विवादों के कारण हत्या की साजिश रची गई थी। आरोप है कि पवनराजे निंबालकर की हत्या के लिए करीब 30 लाख रुपये की सुपारी दी गई थी।

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जांच की खामियों और गवाहों के बयानों पर अदालत की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने माफी के गवाह बने आरोपी के बयानों पर भी गंभीर टिप्पणी की थी। न्यायालय ने कहा कि पहले आरोपी ने कबूलनामा दिया और बाद में अपने बयान से मुकर गया था। आरोपी ने दावा किया कि पुलिस ने उसे धमकाया, मारा-पीटा और फर्जी एनकाउंटर की धमकी भी दी थी। उसने अदालत को बताया कि घटना के समय वह अपने गांव में मौजूद था और उसके रिश्तेदारों ने भी यही बात कही। अदालत ने कहा कि रिश्तेदार झूठ बोल सकते हैं और माफी का गवाह भी झूठ बोल सकता है। न्यायालय ने माना कि आरोपी ने जेल में अकेला होने और बाकी आरोपियों को जमानत मिलने की बात कहकर माफी मांगी थी।

न्यायालय ने जांच प्रक्रिया की कई खामियों पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि जांच के दौरान आरोपियों के मोबाइल फोन जब्त नहीं किए गए और कॉल डिटेल रिकॉर्ड भी पूरी तरह नहीं जुटाए गए। यदि मोबाइल फोन जब्त होते तो आरोपियों के संपर्क और बातचीत की जानकारी सामने आ सकती थी। अदालत ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपियों के पास मौजूद सामान का रिकॉर्ड भी ठीक तरह नहीं रखा गया। सरकारी पक्ष ने दलील दी कि उस समय तकनीकी सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन अदालत इस तर्क से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखी। मामले में 128 गवाहों से पूछताछ हुई और ट्रायल लगभग 15 वर्षों तक चला।

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