पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद मंडल एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर आ गया है। हाल के दिनों में सामने आई घटनाओं ने इस क्षेत्र को आतंकी गतिविधियों के संभावित हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किया है। एक हफ्ते के भीतर तीन अलग-अलग मामलों में हुई गिरफ्तारियों ने संकेत दिया है कि यहां केवल छिटपुट घटनाएं नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क सक्रिय हो सकते हैं। 12 मार्च को संभल की इरम को गाजियाबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया, जिसने कथित रूप से ISI से संपर्क बनाकर महिला विंग तैयार करने की कोशिश की। इसके बाद 16 मार्च को ATS ने हारिस अली को पकड़ा, जिस पर ISIS से जुड़े ऑनलाइन मॉड्यूल के जरिए युवाओं को प्रभावित करने का आरोप है, जबकि दिल्ली पुलिस ने रामपुर के एक किशोर को भी हिरासत में लिया।
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लगातार गिरफ्तारियों से खुला आतंकी नेटवर्क का जाल, एजेंसियां सतर्क
जांच एजेंसियों ने हारिस अली के मामले को नेटवर्क की कार्यप्रणाली समझने में अहम कड़ी माना है। उसने फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट्स के जरिए युवाओं को कट्टरपंथ की ओर मोड़ने की कोशिश की और ‘अल इत्तेहाद मीडिया फाउंडेशन’ नाम से प्लेटफॉर्म बनाकर भड़काऊ सामग्री साझा की। उसने ISIS के मीडिया प्लेटफॉर्म से सामग्री लेकर उसे अपने ग्रुप्स में फैलाया और लोगों को उकसाने का प्रयास किया। जांच में यह भी सामने आया कि उसने भारत के अलावा पाकिस्तान और अन्य देशों में मौजूद हैंडलर्स से संपर्क बनाए रखे।
मुरादाबाद मंडल पहले भी ऐसे मामलों को लेकर चर्चा में रहा है। 2014 में बिजनौर में सिमी से जुड़े आतंकियों के विस्फोट मामले ने इस क्षेत्र में उनकी मौजूदगी उजागर की थी। इसके बाद संभल, रामपुर, अमरोहा और मुरादाबाद से लगातार संदिग्ध गतिविधियों और गिरफ्तारियों की खबरें आती रहीं। हाल के वर्षों में भी फैजान, अनस, शहजीद और मुफ्ती सुहैल जैसे मामलों ने इस पैटर्न को मजबूत किया है, जिससे साफ होता है कि आतंकी संगठन लंबे समय से इस क्षेत्र को सॉफ्ट टारगेट मानते रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियां इस स्थिति के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारणों, इंटरनेट की आसान पहुंच और सीमापार नेटवर्क की सक्रियता को जिम्मेदार मानती हैं। आतंकी संगठन बेरोजगारी और शिक्षा की कमी का फायदा उठाकर युवाओं को निशाना बनाते हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए उन्हें जोड़ते हैं। फर्जी अकाउंट्स, एन्क्रिप्टेड ऐप्स और ऑनलाइन ग्रुप्स के जरिए ये नेटवर्क काम करते हैं, जिससे इनकी पहचान मुश्किल हो जाती है। हालांकि, एजेंसियां अब ज्यादा सतर्क हो गई हैं और तकनीकी संसाधनों, बेहतर समन्वय और जागरूकता अभियानों के जरिए ऐसे नेटवर्क को तोड़ने में जुटी हैं।
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