अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे और दान राशि को लेकर विवाद ने नया मोड़ लिया है। यह अब उत्तर प्रदेश की राजनीति तथा प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन गया है। यह मामला सात जून 2026 को लगाए गए कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों से शुरू हुआ। कुछ ही दिनों में राजनीतिक बयानबाजी, प्रशासनिक जांच और न्यायिक निगरानी की मांग तक पहुंच गया। समाजवादी पार्टी नेताओं ने सबसे पहले चढ़ावे में गड़बड़ी के आरोप लगाए, जिसके बाद विपक्षी दलों ने सरकार और ट्रस्ट से पारदर्शिता की मांग तेज कर दी। सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच प्रक्रिया शुरू करने का संकेत दिया। प्रशासन ने वित्तीय रिकॉर्ड की प्रारंभिक समीक्षा शुरू कर दी, जिससे यह मुद्दा अब राजनीति, आस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का संवेदनशील विषय बन गया है।
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राम मंदिर दान विवाद में पारदर्शिता की मांग तेज
राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र होने के कारण यह विवाद संवेदनशील माना जाता है। देश और विदेश से भक्त मंदिर निर्माण और पूजा व्यवस्था के लिए लगातार दान देते हैं। इसी वजह से दान राशि, चढ़ावा और मूल्यवान वस्तुओं के प्रबंधन पर सवाल उठते हैं। आलोचक कहते हैं कि इतनी बड़ी धनराशि के संचालन में पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए। विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि दान प्रबंधन में अनियमितताओं की संभावना दिखाई देती है। हालांकि किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी ने अभी तक इन आरोपों की पुष्टि नहीं की है। मामला अदालत की निगरानी में जांच की मांग की ओर बढ़ रहा है। कई सामाजिक संगठन और धार्मिक हस्तियां भी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर देती हैं।
सरकार ने SIT गठित कर शुरू की जांच
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताता है। ट्रस्ट महासचिव चंपत राय नियमित ऑडिट प्रक्रिया का हवाला देकर सफाई देते हैं। वे बताते हैं कि दान पेटी और आय का समय-समय पर आंतरिक ऑडिट कराया जाता है। ऑडिट में ट्रस्ट प्रतिनिधि और भारतीय स्टेट बैंक के अधिकारी शामिल रहते हैं। ट्रस्ट का कहना है कि अब तक कोई वित्तीय गड़बड़ी सामने नहीं आई है। चंपत राय आरोपों को मंदिर की प्रतिष्ठा और श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताते हैं। ट्रस्ट कहता है कि बिना प्रमाण आरोप समाज में भ्रम फैलाते हैं। सभी वित्तीय रिकॉर्ड नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार सुरक्षित रखे जाते हैं।


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