ईरान और अमेरिका के बीच पिछले तीन हफ्तों से जारी तनावपूर्ण युद्ध का असर अब धीरे-धीरे तेल बाजार पर साफ तौर पर दिखने लगा है। इसी कड़ी में, भारतीय तेल कंपनियों ने प्रीमियम-ग्रेड यानी पावर पेट्रोल की कीमतों में 2.30 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है, जिसे इस संकट का शुरुआती असर माना जा रहा है। दरअसल, पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर ईंधन आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, जिससे तेल बाजार में अस्थिरता देखने को मिल रही है।
CNBC आवाज की रिपोर्ट के अनुसार, पेट्रोल डीलरों ने इस बढ़ोतरी की पुष्टि की है और बताया है कि फिलहाल यह वृद्धि केवल प्रीमियम यानी पावर पेट्रोल तक सीमित रखी गई है। वहीं, आम उपभोक्ताओं को राहत देते हुए रेगुलर पेट्रोल की कीमतों में अभी कोई बदलाव नहीं किया गया है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात ऐसे ही बने रहे, तो आने वाले समय में अन्य ईंधन की कीमतों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
पावर प्रीमियम पेट्रोल ₹2.30 महंगा, उपभोक्ताओं पर असर
हालांकि, इस फैसले का असर मुख्य रूप से उन ग्राहकों पर पड़ेगा जो हाई-ऑक्टेन या प्रीमियम पेट्रोल का उपयोग करते हैं। आमतौर पर, इस तरह का पेट्रोल बेहतर इंजन परफॉर्मेंस, स्मूद ड्राइविंग और ज्यादा माइलेज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में, इसकी कीमत बढ़ने से खासकर लग्जरी और हाई-परफॉर्मेंस वाहनों के मालिकों पर सीधा असर पड़ेगा।
इसके अलावा, जो लोग नियमित रूप से अपने वाहनों में प्रीमियम पेट्रोल का इस्तेमाल करते हैं, उनके मासिक ईंधन खर्च में भी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। भले ही यह बढ़ोतरी प्रति लीटर के हिसाब से कम लगे, लेकिन लगातार उपयोग करने वालों के लिए यह कुल खर्च को काफी बढ़ा सकती है। वहीं, कुछ उपभोक्ता अब लागत कम करने के लिए रेगुलर पेट्रोल की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे उनकी गाड़ी के परफॉर्मेंस पर भी असर पड़ सकता है।
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वैश्विक कीमतों में उछाल बना वजह
वहीं, तेल कंपनियों की ओर से इस बढ़ोतरी का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है, लेकिन जानकारों का मानना है कि ईरान युद्ध के चलते वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और लॉजिस्टिक्स लागत में वृद्धि इसकी मुख्य वजह हो सकती है। दरअसल, अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले और तेहरान की जवाबी कार्रवाई के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे वैश्विक बाजार में हलचल मच गई है। इसके अलावा, भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कोई भी बढ़ोतरी सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था पर असर डालती है।
इसी के साथ, यह स्थिति भारत के लिए बड़ा आर्थिक जोखिम भी पैदा कर रही है। बढ़ती कीमतें न केवल चालू खाते के घाटे को बढ़ाती हैं, बल्कि रुपये पर दबाव डालती हैं और आम लोगों व व्यवसायों के लिए ईंधन लागत भी बढ़ाती हैं। वहीं, स्थिति को और गंभीर बनाते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। युद्ध के बाद इस अहम मार्ग से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जबकि सामान्य तौर पर हर दिन करीब 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल और 50 लाख बैरल तेल उत्पाद यहीं से गुजरते थे। चूंकि भारत का लगभग आधा कच्चा तेल आयात, 40 प्रतिशत गैस आयात और 85-90 प्रतिशत एलपीजी आपूर्ति इसी मार्ग से होती थी, ऐसे में यह हालात देश के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं।
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