भारतीय हीरा उद्योग में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहली बार लगातार दो महीनों तक मात्रा के आधार पर लैब-ग्रोन डायमंड (LGD) का निर्यात प्राकृतिक हीरों से अधिक रहा। जेम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) के अनुसार मार्च 2026 में भारत ने 13 लाख कैरेट और अप्रैल में 14 लाख कैरेट लैब-ग्रोन हीरों का निर्यात किया, जबकि इसी अवधि में प्राकृतिक हीरों का निर्यात क्रमशः 12 लाख और 13 लाख कैरेट रहा।
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प्राकृतिक हीरों की मांग और निर्यात में गिरावट
इस बदलाव का सबसे बड़ा केंद्र सूरत बना हुआ है, जहां दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत हीरों की पॉलिशिंग होती है। उद्योग से जुड़े अनुमान बताते हैं कि प्राकृतिक हीरों की कटिंग-पॉलिशिंग करने वाली अधिकांश कंपनियां अब LGD कारोबार में भी उतर चुकी हैं। जनवरी 2025 में कुल निर्यात में LGD की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत थी, जो मार्च और अप्रैल 2026 में बढ़कर 50 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई।
हालांकि मूल्य के लिहाज से प्राकृतिक हीरे अभी भी काफी आगे हैं। भारत से निर्यात होने वाले पॉलिश्ड LGD की औसत कीमत 74 डॉलर प्रति कैरेट से कम है, जबकि प्राकृतिक हीरों की कीमत इससे कई गुना अधिक बनी हुई है। इसके बावजूद LGD ने सूरत के संकटग्रस्त हीरा उद्योग को राहत दी है।
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सूरत के हजारों हीरा कारीगरों को रोजगार दिया
रूस-यूक्रेन युद्ध, रूसी हीरों पर प्रतिबंध और अमेरिकी टैरिफ के कारण प्राकृतिक हीरा उद्योग को भारी नुकसान हुआ। 2022 से 2024 के बीच भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात कारोबार लगभग आधा रह गया। सूरत में हजारों कर्मचारियों ने नौकरियां गंवाईं और कई इकाइयां बंद हो गईं।
ऐसे समय में LGD उद्योग ने रोजगार और उत्पादन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कम कीमत और अधिक मुनाफे के कारण वैश्विक ज्वेलर्स भी LGD को तेजी से अपना रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती निर्यात मात्रा ने सूरत के हीरा उद्योग को पूरी तरह ढहने से बचा लिया है, हालांकि भविष्य में इसकी स्थिरता सबसे बड़ी चुनौती बनी रहेगी।


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