टीवी शो ‘पवित्र रिश्ता’ से घर-घर में पहचान बनाने वाली अभिनेत्री उषा नाडकर्णी ने हाल ही में अपनी निजी जिंदगी के कई दर्दनाक पहलुओं का खुलासा किया। करीब सात दशकों से अभिनय की दुनिया में सक्रिय उषा ने बताया कि उन्होंने अपने करियर में हमेशा अपने दम पर पहचान बनाई। उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों के साथ-साथ टीवी इंडस्ट्री में भी अपनी मजबूत छाप छोड़ी। 80 साल की उम्र में भी वे मुंबई में अकेले रहकर अपनी जिम्मेदारियां खुद निभा रही हैं। उनका कहना है कि उन्होंने जिंदगी को हमेशा अपने तरीके से जिया है।
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बचपन में पिता की प्रताड़ना और अभिनय के सपने के लिए घर छोड़ने की मजबूरी
उषा नाडकर्णी ने बताया कि उनका बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। उनके पिता एयरफोर्स में अधिकारी थे, लेकिन उनका स्वभाव बहुत गुस्सैल और हिंसक था। छोटी-छोटी बातों पर वे परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट करते थे। एक बार उन्होंने अपने भाई को बचाने की कोशिश की तो पिता ने उन पर कोइता से हमला कर दिया, जिससे उनके हाथ में गंभीर चोट आई। इसके बावजूद उषा ने अगले ही दिन अपने नाटक में हिस्सा लिया और अपने अभिनय के जुनून को नहीं छोड़ा।
एक्ट्रेस ने बताया कि उनकी मां भी उनके अभिनय के फैसले के पक्ष में नहीं थीं। जब उन्होंने एक्टर बनने की इच्छा जताई, तो मां ने नाराज होकर उनका सामान घर से बाहर फेंक दिया। कुछ दिनों तक उन्हें अपनी दोस्त के घर रहना पड़ा, लेकिन बाद में उनके पिता उन्हें वापस घर ले आए। कठिन हालात के बावजूद उषा ने अपने सपने का पीछा नहीं छोड़ा और मेहनत के दम पर इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई।
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पति से अलगाव, बेटे से दूरी और 1987 से अकेले जीने का सफर
उषा नाडकर्णी ने पहली बार अपने वैवाहिक जीवन पर भी खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि वे कई साल पहले अपने पति से अलग हो चुकी थीं, लेकिन उनके मन में किसी के लिए कोई कटुता नहीं है। उनका बेटा विदेश में रहता है और बचपन से अपनी नानी और मामा के साथ बड़ा हुआ। व्यस्त शूटिंग शेड्यूल के कारण उषा अपने बेटे को पर्याप्त समय नहीं दे सकीं। यही वजह रही कि आज उनका बेटा अपनी नानी को ही अपनी असली मां मानता है, जिसका दुख अभिनेत्री को आज भी है।
उषा नाडकर्णी वर्ष 1987 से अकेले रह रही हैं। शुरुआती दिनों में उन्हें अकेले रहने से डर लगता था, लेकिन समय के साथ उन्होंने इस डर पर भी जीत हासिल कर ली। अब वे जीवन और मृत्यु दोनों को पूरी सहजता से स्वीकार करती हैं। उनका मानना है कि इंसान अपनी मौत का समय या तरीका तय नहीं कर सकता, इसलिए उसे हर पल निडर होकर जीना चाहिए। 80 वर्ष की उम्र में भी उनका आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच कई लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
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