“सिनेमा समाज का दर्पण है,” यह वाक्य कई बार फिल्मों पर लिखे गए लेखों में देखा जा चुका है. अब लोग अपने मोबाइल के कैमरे को फ्लिप करके अपना चेहरा देखना शुरू कर चुके हैं. यह सिर्फ खुद को जानने की बात नहीं रही, बल्कि अब यह सेल्फी लेने तक सीमित हो गया है. सब कुछ इतना आत्मकेंद्रित होता जा रहा है कि न तो अब किसी को धर्म की चिंता है और न ही समाज की. दीनी तालीम के दौरान किसी ने भी यह नहीं समझा कि ज्ञान की असल अहमियत क्या है, और लोग अब अपने मुसलमान ईमान के अर्थ को भी भूलते जा रहे हैं.
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फुले की समानता और शिक्षा की लड़ाई: आजादी से पहले का एक महत्वपूर्ण योगदान
उत्तर की सियासत में इन दिनों पीडीए पर जोर है. फुले ने यही काम आजादी से पहले किया. पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के एका के बूते आजादी की लड़ाई लड़ने की बात उन्होंने कही और इसके लिए जरूरी थी समाज में समानता और शिक्षा के अधिकार की लड़ाई. फुले बहुत सारे स्कूलों में पढ़ाए नहीं जाते. अधिकांश आबादी को पता ही नहीं कि जब महाराष्ट्र और गुजरात एक ही सूबे थे और बॉम्बे कहलाते थे, तब के महाराजा ने देश में पहली बार किसी को आधिकारिक रूप से महात्मा की उपाधि दी। मोहनदास करमचंद गांधी के महात्मा गांधी बनने से भी पहले.
अनंत महादेवन: अभिनय से निर्देशन तक, ‘फुले’ उनकी सिनेमाई साधना
अभिनेता से निर्देशक बने अनंत (नारायण) महादेवन ने कैमरे के आगे और पीछे अपनी जवानी के दिनों में खूब कूद फांद की. केरल में जन्मे, महाराष्ट्र में मशहूर हुए अनंत को बायोपिक बनाने में आनंद ‘मी सिंधुताई सपकाल’ से आना शुरू हुआ. कम लोग ही जानते होंगे लेकिन केरल के मशहूर अंतरिक्ष वैज्ञानिक नंबी नारायणन पर बनी फिल्म ‘रॉकेट्री’ भी पहले वह ही निर्देशित करने वाले थे. उनकी बनाई ‘गौर हरी दास्तान’ भारतीय सिनेमा की धरोहर है. उनकी एक और फिल्म ‘माई घाट’ अब भी रिलीज की कतार में हैं। फिल्म ‘फुले’ उनकी साधना है.
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गेंदा फूल: जाति, संघर्ष और समाज की उलझी हुई तस्वीर
साधना इसलिए क्योंकि इसमें विघ्न कम नहीं हुए हैं. यह समाज के दबे कुचले उस वर्ग की कहानी है जिसे पहली बार ‘दलित’ कहकर फुले ने ही पुकारा. फुले दरअसल ज्योतिराव की जाति नहीं है. फूलों के किसान परिवार में जन्मे ज्योतिराव के पिता ने ये सरनेम अपने नाम के साथ राजा से मिली जमीन पर खेती करने के साथ रखा. गेंदा फूल फिल्म के शुरू से आखिर तक रहता है. पीले चटख रंगों वाला. समाज के संभ्रांत परिवार के घरों को सजाने वाला. देवताओं पर चढ़कर इतराने वाला और, जो इसे उगाता है, उसकी परछाई तक से देवताओं की पूजा करने, करवाने वाले कतराते हैं.
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